Header Ads

सुमित्रानन्दन पन्त का संपूर्ण जीवन परिचय


प्रगतिवादी रहस्यवादी छायावादी कोमल भावनाओं के कवि सुमित्रानंदन पन्त का जन्म हिमालय के सुरम्य  प्रदेश (कुमायुँ) के कौशानी ग्राम में 20 मई सन् 1900 को हुआ था । जन्म के कुछ ही घंटो बाद मां का निधन हो गया। इनका पालन पोषण इनकी दादी माँ ने किया । 7 वर्ष की आयु में चौथी कक्षा में पढ़ते हुए इन्होंने सर्व प्रथम छंद की रचना की । जब आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अल्मोड़ा आये। अब तक इनका नाम गुसाई दत्त था । यहीं पर इन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया , अल्मोड़ा से हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात इनके पिता गंगा दत्त ने इन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजा। इंटरमीडियट में पढ़ते समय महात्मा गांधी के प्रभाव से आपने कॉलेज छोड़ दिया । सत्याग्रह में भाग न  लेकर, साहित्य साधना में लग गये। आपने प्रयाग में रहते हुए प्रगतिशील विचारों से युक्त 'रूपाभा' नामक पत्रिका निकाली।
आप अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध कवि शेली एवं कीट्स की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित हुए। रविंद्रनाथ ठाकुर का भी आप की शैली पर  प्रभाव पड़ा।
            वीणा से गुंजन तक की पंत की कविता का मूल भाव प्रकृति प्रेम एवं केंद्रित उल्लास है ; जिसमें वस्तु - सत्य के साथ - साथ आत्म - सत्य के समन्वय का प्रयास है।  गुंजन के बाद युगांत से युग वाणी और 'ग्राम्य' तक कवि की अनुभूति एवं जिज्ञासावृत्ति अधिक सजक और सचेत हो उठी हैं । उनके भावोन्माद  का विलास हुआ हैं और उनकी चिंतन-सरणि भाव जगत में बैठने की अपेक्षा वस्तु जगत में अधिक खुल कर विचरण करती है ।
         सन् 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' से प्रेरित हो कर 'लोकायन' नामक सांस्कृतिक-पीठ की योजना बनायी । उसे  क्रियान्वित करने के लिए विश्व प्रसिद्ध नर्तक उदयाशंकर से संपर्क स्थापित किया और फिर उनके साथ भारत भ्रमण को निकल पड़े । इसी भ्रमण में इनका अरविंद से परिचय हुआ और उनके विचारों से विशेष प्रभावित हुए। प्रयाग लौट कर अनेक काव्य संकलन प्रकाशित किये-यथा   स्वर्ण किरण 'स्वर्ण दूलि' उत्तरा आदि । 1950 में ये आकाशवाणी से संबंध हुए। और प्रयाग में रहकर स्वच्छंद रूप से साहित्य सर्जन कर रहे थे । इनके संगलन 'युगान्त' की रचनाओं में हम इन्हें पुरानी व्यवस्था को विनष्ठ कर के नई व्यवस्था को लाने के लिए उत्सुक देखते हैं। इनकी विद्रोहशील भावना को लेकर पंत जी कार्लमाकर्स के साम्यवाद के प्रति आकर्षित हुए । इनके युगवाणी और 'गाम्या' संकलनों की रचनाओं में इसी विचारधारा को अभिव्यक्ति मिली है। पंत जी की काव्य दृष्टि के विकास में उनके काव्य संकलन 'पल्लव' की रचना 'परिवर्तन' का विशेष महत्व है । इस रचना में सौंदर्य के कवि के रूप में नहीं वरन जगत के जीवन प्रवाह के कठोर यथार्थ के द्रष्टा के रूप में प्रकट होते हैं । इन्हें 'कला और बूढ़ा चाँद' पर  साहित्य अकादमी , लोकायतन पर सोवियत और चिदम्बरा पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले हैं ।
        उत्तर प्रदेश सरकार ने आपकी रचनाओं से प्रसन्न होकर एक लाख रुपए कर पुरस्कार प्रदान किया। भारत सरकार द्वारा दिल्ली में आपका स्वागत किया गया । पंत जी का देहावसान 28 दिसंबर 1977 को हो गया।
रचनाएं - वैसे तो 15-16 वर्ष की आयु में लिखी गई कविताएं अल्मोड़ा की हस्तलिखित पत्रिकाओं  में छपा करती थी। लेकिन प्रकाश्य  रूप से उनकी कविताएं 1919 में स्वरसती के पृष्टो पर दृष्टिगत होने लगी। रचनाओं का क्रम निम्न रूप से है ।
कविताएं - वीणा,पल्लव , ग्रंथि,  गुंजन,  युगांत , युगवाणी , ग्राम्य , स्वर्ण, स्वर्णधूलि ,  मधुज्वाल , उत्तरा, युग पथ , पल्लविनी , आधुनिक कवि पंत ।
नाटक- परी ,क्रीड़ा , रानी , ज्योत्सना (एक कल्पना रूपक मेटरभिक पद्धति का प्रतीक , उनके कुछ रेडियो नाटक भी प्रकाशित हुए हैं।)
उपन्यास - हार ।
कहानी संग्रह - पांच कहानियां ।
निबंध और आलोचना - अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए लिखित 'पल्लव' की भूमिका आधुनिक कवि पन्त का  उत्तरा की भूमिका आदि निबंधों का संग्रह सन् 1943 ई० में प्रकाशित हुआ।

No comments

Comments system