माखनलाल चतुर्वेदी का संपूर्ण जीवन परिचय
हिंदी जगत के सुप्रसिद्ध कवि पं० माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को बावई होशंगबाद (मध्य- प्रदेश) में हुआ था। इनके इनके पिता का नाम श्री नंद लाल चतुर्वेदी था । इन्होंने घर पर ही रहकर संस्कृत, बांग्ला ,गुजराती तथा अंग्रेजी का अध्ययन किया । आपने जीवन के आरंभ में अध्यापन कार्य किया । आप 'कर्मवीर' राष्ट्रीय दैनिक एवं प्रतिष्ठित पत्रो के संपादन कौशल के साक्षी बने थे। यह 'श्री गणेश शंकर विद्यार्थी' से विशेष प्रभावित थे। चतुर्वेदी जी को अनेक सम्मान प्राप्त हुए । 'हिमकिरीटनी' पर इनको 'देव पुरस्कार' एवं हिमतरंगिनी पे 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनकी साहित्य सेवा को भारत सरकार ने 'पदम भूषण' की उपाधि तथा सागर विश्वविद्यालय में 'डि लिट्' की उपाधि द्वारा सम्मानित किया । इनका निधन सन 1968 में हुआ।
रचनाएं - हिमकिरीटनी ,हिमतरंगिनी, युगचरण ,समर्पण, माता , वेणुलो, गूंजे धरा, आदि इनके कविता संग्रह हैं।
काव्यगत विशेषताएं - चतुर्वेदी जी के काव्य का मूल स्वर राष्ट्रवादी है। जिसमें त्याग ,बलिदान , कर्तव्य भावना और समर्पण का भाव विद्यमान है । उनकी कविताओं में भारतीयता के दर्शन होते हैं उनके काव्य में भारतीयता , राष्ट्रीयता तथा विद्रोह का स्वर मुखीर हुआ है। माखनलाल चतुर्वेदी का भाव खड़ी बोली है; उनकी भाषा भावानुकूल परिवर्तित होती रही है । उर्दू ,फारसी तथा अरबी शब्दों का प्रयोग इनकी भाषा में मिलता है। उन्होंने मुक्तक काव्य शैली द्वारा अपने भावनाओं को स्वर प्रदान किया है । विषयानुसार इनकी रचना शैली ने विविधता अपनाई है । कहीं ओजस्वी हुंकार लिए त्याग और देशभक्ति के स्वर है तो कहीं ममता प्रेम और करुणाशक्ति वाग्धारा प्रवाहित हुई है। भावनात्मकता आपकी शैली का प्रधान गुण है । इन्होंने प्रस्तुतिकरण को मर्मस्पर्शी बनाया है ।
साहित्य में स्थान - माखनलाल चतुर्वेदी कवि होने के साथ-साथ एक पत्रका, निबंधकार और सफल संपादक भी थे । अतः इनकी साहित्य सेवा बहुमुखी थी , इनके व्यक्तित्व की तेजस्विता और फक्कड़पन उनके काव्य में भी सर्वत्र प्रतिविंबित हुआ है । स्वाभिमानी और स्पष्ट- वादी होने के साथ-साथ आति भावुक भी थे। यही कारण है कि उनकी काव्य रचनाओं में जहां एक ओर आग है तो दूसरी ओर करुणा की भागीरथी भी है । इन्होंने त्याग ,बलिदान ,देशभक्ति का अनूठा संगम हिंदी काव्य सरिता को प्रदान किया है । शब्द उनकी भावनाओं का अनुगमन करते प्रतीत होते हैं।
आप की यह कविता बहुत प्रसिद्ध हैं !
चाह नहीं, मैं सुरबाला के, गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में, बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर ,चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने, जिस पथ पर जावें वीर अनेक!
चाह नहीं, मैं सुरबाला के, गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में, बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर ,चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने, जिस पथ पर जावें वीर अनेक!
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