गजानन माधव 'मुक्तिबोध' का संपूर्ण जीवन परिचय
परकता छायावादी दुर्बल मुक्तिबोध का जन्म चंबल घाटी के पास ग्वालियर रियासत के मुरैना जिले में 13 नवंबर सन 1917 ई० को हुआ था । इनके पिता पुलिस विभाग में सबइंस्पेक्टर पद पर नौकरी करते थे । इनके पितामह भी पुलिस विभाग में ही नियुक्त थे। मुक्ति बोध का बचपन सभ्य सुसंस्कृति कुलीन ब्राह्मण परिवार में बीता। इनकी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई और ये अपनी बुआ की देख रेख में इंदौर के होलकर कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास किये।
पढ़ाई के दौरान ही घर पर काम करने वाली नौकरानी की पुत्री शांताबाई से प्रेम संबंध हो गया और कुछ समय बाद उससे विवाह कर लिए ।
स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करके इन्होंने उज्जैन के मॉडर्न स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे। तत्पश्चात् जबलपुर के हितकारणी हाई स्कूल एवं उसके बाद राजनांद गांव में अध्यापन का कार्य किये। यहां पर ये अपने एक बहुत ही पुराने मकान में रहते हुए अधिक समय प्रकृति के साथ बिताने लगे और अपने विचारों को रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे। इस दौरान आपने अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं की।
पढ़ाई के दौरान ही घर पर काम करने वाली नौकरानी की पुत्री शांताबाई से प्रेम संबंध हो गया और कुछ समय बाद उससे विवाह कर लिए ।
स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करके इन्होंने उज्जैन के मॉडर्न स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे। तत्पश्चात् जबलपुर के हितकारणी हाई स्कूल एवं उसके बाद राजनांद गांव में अध्यापन का कार्य किये। यहां पर ये अपने एक बहुत ही पुराने मकान में रहते हुए अधिक समय प्रकृति के साथ बिताने लगे और अपने विचारों को रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगे। इस दौरान आपने अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं की।
सन 1945 में प्रसिद्ध मासिक पत्रिका 'हंस' का संपादन कार्य करने लगे। बाद में उन्होंने कलकत्ता ,जबलपुर, नागपुर आदि का भ्रमण किया ।
नागपुर में कुछ समय तक रेडियो के समाचार संपादन का कार्य किया । लेकिन इनका स्थांतरण शीघ्र ही भोपाल हो गया ,उन्हें वहां जाना अच्छा नहीं लगा, अतः उसे छोड़ दिये। नागपुर से निकलने वाली पत्रिका 'नया खून' का संपादन करते हुए नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।
सन 1958 में राजगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के पद पर आपका चयन हो गया । वहीं पर सेवा करते-करते सन 1964 में येपरलोकवासी हो गए।
नागपुर में कुछ समय तक रेडियो के समाचार संपादन का कार्य किया । लेकिन इनका स्थांतरण शीघ्र ही भोपाल हो गया ,उन्हें वहां जाना अच्छा नहीं लगा, अतः उसे छोड़ दिये। नागपुर से निकलने वाली पत्रिका 'नया खून' का संपादन करते हुए नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।
सन 1958 में राजगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के पद पर आपका चयन हो गया । वहीं पर सेवा करते-करते सन 1964 में येपरलोकवासी हो गए।
मुक्तिबोध शोषण,अत्याचार,विषमता और पीड़ा से मुक्त स्वस्थ बंधन रहित समाज की स्थापना करना चाहते थे । अतः उन्हेंने पद प्रतिष्ठा और उन्नति की सीढ़ियां चढ़ते हुए बुद्धिजीवियों की मानसिकता दासता के युग में एक ललकार के रूप में हिंदी काव्य जगत में पदार्पण किये।
चालक बुद्धिजीवियों की सुख भोग जीवन शैली एवं स्वार्थपरता पर गहरी चोट करने वाले गजानन माधव मुक्तिबोध अस्पष्ट लगते थे। लेकिन उनकी जीवन पद्धति बिल्कुल सरल थी । उन्होंने सुविधाओं से युक्त जीवन पद्धति पर तीखा प्रहार करते हुए अपनी समन्वयवादी सामाजिक भावना को प्रकट किया हैं।
"जीवनानुभवों से जुड़ी हुई परंपरा के रूप में भाषा एक सामाजिक निधि है" उनका यह विचार स्पष्ट कर देता है कि काव्य भाषा में कवि के अनुभूति को सम्प्रेणय बनाने की अद्भुत शक्ति है । वह जीवन के तथ्यों को उजागर करने में सक्षम है और कवि मानस की जटिलताओं को सही रूपकार प्रदान करने वाली भाषा है ।
अपने सामाजिक विषमताओं को संजीव और यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है ।
कृतियाँ- गजानन माधव मुक्तिबोध मुख्यतः कवि थे। लेकिन उन्होंने कविता के अतिरिक्त निबंध,कहानियां एवं समीक्षा साहित्य लिखे हैं।
कविता संग्रह- चांद का मुंह टेढ़ा है ,भूरी-भूरी कनक धूल , इसके अतिरिक्त 17 रचनाएं "तार सप्तक" में प्रकाशित हुई थी ।
कहानी संग्रह- काठ का सपना , सतह से उठता आदमी ,
निबंध संग्रह- नई कविता का आत्मसंघर्ष , नये साहित्य का सौंदर्य शाखा
इसके अतिरिक्त एक डायरी का प्रकाशन 1964 ई० में हुआ ।
समीक्षा - कामायनी - एक पुनर्विचार , उर्वर्शी , समीक्षा की समस्याएं, सुमित्रानंदन पंत , हरी घास क्षण भर, नई समीक्षा आदि।
कहानी संग्रह- काठ का सपना , सतह से उठता आदमी ,
निबंध संग्रह- नई कविता का आत्मसंघर्ष , नये साहित्य का सौंदर्य शाखा
इसके अतिरिक्त एक डायरी का प्रकाशन 1964 ई० में हुआ ।
समीक्षा - कामायनी - एक पुनर्विचार , उर्वर्शी , समीक्षा की समस्याएं, सुमित्रानंदन पंत , हरी घास क्षण भर, नई समीक्षा आदि।



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