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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का संपूर्ण जीवन परिचय


आधुनिक हिंदी कविता के विकास क्रम में भारतेंदु युग, द्विवेदी युग , छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद काव्य- धाराओं का विकास हुआ है । सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का हिंदी प्रयोगवाद में नई कविता तक काव्य- यात्रा करने वाले कवियों में महत्वपूर्ण स्थान है। प्रयोगवाद नईं कविता का पूर्व पक्ष है । इसकी शुरुआत सन 1943 ई० में प्रकाशित तार सप्तक में हुई। सामान्यतः सन् 1943 से 1960 तक की कविताओं को प्रयोगवादी कविता कहा जाता है ।
      नई कविता में हमें जो अन्वेषण दृष्टिगोचर होते हैं, सामाजिक यथार्थ की जो दृष्टि मिलती है वह नये मूल्यों के आगमन की आवाज सुनाई देती है। इसके अतिरिक्त नई कविता में सौंदर्य बोध को प्रकट करने के लिये जो नई भाषा और नया शिल्प दिखाई देता है- वह सब हम सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के काव्य में मिलता है । उनके अनुभव में व्यक्ति और युग जीवन इस प्रकार सम्पृक्त है कि चरम संवेदना में भी युग का यथार्थ चित्रण हुआ है। तांवे का फूल, नीला अजगर, पाठ की घंटी आदि कविताओं में कवि की आत्मा चेतना, वयक्ति की समष्टि की व्यापकता परिलक्षित होती है । अनेक कविताओं में उन्होंने युद्ध सक्ति स्वतंत्रता साम्यवाद आदि ज्वलंत समस्याओं को उठाया और उनकी बिल्कुल साधारण एवं नये प्रतीकों के माध्यम से सघन अनुभव के रूप में संगठित और संयोजित किया हैं। इस प्रकार नई कविता का विकास युग सत्य,युग यथार्थ से हुआ है । अब यह किसी काल्पनिक जीवन की अभिव्यक्ति नहीं करता , न ही करना चाहता है । अब तो वह जिंदगी की विषमताओं कटुआहटों के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है । यह रूढ़ियाँ के प्रति विद्रोह है । आज की कविता घिसी-पिटी रूढ़ियों से सतर्क हो कर नये उबड़-खाबड़ पठारों पर अपनी दृष्टि केंद्रित करती है । आज की कविता जीवन के यथार्थ और उसकी व्यस्तता के बीच ही प्रेम और आकर्षण के क्षण खोज लेती है। नया कभी आज के जीवन और कठोर जीवन में मधुर संबंध को जीता है । आज की कविता में स्व स्वप्निल  और आकाश चांदनी का कवि की उड़ाने नहीं होती बल्कि धरती की चीजों और अपने परिवेश से प्यार करता है ।

              परिवेश की सीमा रेखा अपना घर, गांव, शहर, देश ना हो कर बल्कि संपूर्ण सृष्टि है । लेखक एवं कवि के परिवेश के संबंध में वात्स्यायन ने लिखा है - "मेरा परिवेश प्राचीन लेखक की तुलना में बहुत विशाल है उसमें एटम बम है , भूदान है, ई० ई० सी० है और नाये है पी० एल० 480 है , वियतनाम है , हिंदी-चीनी भाई-भाई हैं। नाथूला है, कांचीका चेकला और तिम्मा रेड्डी है , भारत का स्वधीन राष्ट्र है, पीलू मोदी है, हाइयो था आमस  ग्रंथ है, शतदल पड़म है और बहुत कुछ सभी कुछ है" तात्यर्र यह है कि नई कविता नया लेखक अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ से परिवेश को पकड़ने और समझने का प्रयास करता है।
              आरंभ में सर्वेश्वर का काव्य संसार रोमांटिक संवेदना से परिपूर्ण है लेकिन धीरे-धीरे कवि अनुभव में प्रौढ़ता और परिपक्वता आती है , और भावुकता और भावमयता का कला संसार खंड-खंड हो कर बिखर जाता है । तपे हुए अनुभवों की 'गर्म हवाएं' चलने लगती हैं और विचारों के जंगल में कभी निर्भीक होकर प्रवेश करता है । सामाजिक सडाघ, घुटन और दबाओ को निराला की भांति सर्वेश्वर भी महसूस करते हैं लेकिन अन्य कवियों की तरह सर्वेश्वर संकेत नहीं करते बल्कि खुलकर कह देते हैं। इसीलिये भाव संपदा ज्ञान संपादन और अनुभव समृद्धि , में किसी एक वर्ग के कवि नहीं बल्कि सबके कवि हैं और सब के लिए लिखते हैं।    
             द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुराना संसार ही नष्ट हो गया और जो नया संसार पैदा हुआ उसकी चुनौतीयाँ उस की विचारधाराएं , वृतियां सर्वथा भिन्न है - विज्ञान के लिए दुनिया छोटी हो रही है और कवि के लिए बड़ी। कवि इस विनाश  (द्वितीय विश्व युद्ध) से कितनी गहराई से जुड़ा है परिवेश गत तड़प उन्हीं के शब्दों में - "शब्द जिन्हें मैं सुनता हूं; मर चुके हैं। संबंध जिह्वेे मैं जीता हूं; मर चुके हैं । हर क्षण एक दर्पण टूटता है; एक आकृति मरती है, चाहे वह ईश्वर की हो या आदमी की।    
          राजनीतिज्ञों के आचरण से क्षुब्ध होकर वह कहते हैं कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आ जाय, कुछ नहीं हो सकता हैं। सब दल व्यक्तिगत स्वार्थ में आकण्ड डूबे हैं । समाजवाद और समानता के नाम पर घोर असमानता और असामाजिक ही प्रदान करेंगे।
        सर्वेश्वर जहां जन्में, पनपे  बड़े हुए वह गरीबी का विशाल पटल है । पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव जहां गरीबी का साम्राज्य है- सदियों से यहां की जनता अध नंगी, अध भूखे पेट जिंदगी गुजारने पर मजबूर है। रोटी के लिए तरसते हैं । अधिकांश जमीन ऊसर हैं और जो थोड़ी बहुत ठीक है तो कृषि योग्य उचित और साधन ना होने के कारण पैदावार नहीं होती है , यही इस पर सर्वेश्वर दयाल का बचपन बीता था ।
कृतियाँ - सर्वेश्वर दयाल के  मुख्यतयः कवि है लेकिन कविताओं के अतिरिक्त भी आपने कहानियां एवं अन्य रचनाएं भी की हैं ।
प्रमुख रचनाएं - काठ की घंटियां , बांस का पुल, एक सूनी नाँव, गर्म हवाएं , जगत का अर्थ ।
सर्वेश्वर की संवेदना के विविध आयाम - रागात्मक संवेदना, पीड़ा बोध , वैचारिक संवेदना, समकालीन परिवेश का बोध, व्यम सृष्टि , सौंदर्यबोध, मूल्य बोध, लोक संपृक्ति और लोकनुभूति , मानवीय कसवा।
सर्वेश्वर की कविता का अभिव्यक्ति पक्ष- भाषा, प्रतीक विधान, विम्ब विधान, अप्रस्तुत विधान।

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