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जयशंकर प्रसाद का संपूर्ण जीवन परिचय (महाकवि)


छायावादी एवं रहस्यवादी , युग प्रवर्तक, नाटककार 'उपन्यासकार' कहानीकार आदि बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी जयशंकर प्रसाद का जन्म उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध नगरी "काशी" में सन 1890 ई० में हुआ था।ये वैश्य जाति के थे। इनका परिवार काशी में सुँघनी साहू के नाम से प्रसिद्ध था । 12 वर्ष की अल्प आयु में ही इनके पिता का देहांत हो गया। इस कारण इनकी स्कूली शिक्षा अधिक नहीं हो सकी । स्थानीय क्वींस कॉलेज से सातवीं कक्षा तक ही  शिक्षा हो सकी । परिवार का भार अब दादा शंभू रत्न पर आ गया । शंभू रत्न पढ़ाई की अपेक्षा शारीरिक स्वार्थ के प्रेमी थे । उनके निर्देशन पर बालक जय शंकर को खाने-पीने और मल्ल विद्या पर ज्यादा ध्यान देना पड़ा । मध्याह्  तक कार्य करने के उपरांत बड़े भाई के सामने बैठकर भोजन करना पड़ता  वह अधिक से अधिक ही खिलाते पानी और चावल कम लेने देते थे । प्रातः डेढ़  पाव बादाम,पाव भर घी और पांच सेर दूध हरीरा,दिन में पांव भर से डेढ़ पाव तक घी   तीसरे पहर दो ढाई सेर के दाने का रस और सायंकाल व्यायाम से पहले डेढ़ पाव बादाम की ठंडाई और रात में आधा सेर तीन पाव मलाई के साथ पूरिया खाने के बाद पांच सेर दूध आधावट से दैनिक भोजन सूत्र की समाप्ति करनी पड़ती। इसमें कमी होने उनके अग्रज को सह नहीं था और डांट सुननी पड़ती।
केवल 7 वर्ष की आयु में ही समग्र 'अमर कोश' तथा 'अष्टाध्याई' (पाणिनि) के सूत्र कंठस्थ कर लेने वाले ज्ञान पिपासु बालक जयशंकर स्वाध्याय का अवसर निकालने के साथ-साथ लेखन का कार्य भी करने लगे।
प्रसाद जी का विवाह नवयौवन में ही हो गया था ,किंतु वे इसका सुखोपभोग ज्यादा दिनों तक नहीं कर पाए। कारण पत्नी का क्षय रोग, जिसके कारण सन 1916 में पत्नी स्वर्ग सिधार गयीं । सन 1917 में एक अत्यंत सादा समारोह से उनका दूसरा विवाह कर दिया गया किंतु मौत ने तो घर देख ही लिया था । एक या डेढ़ वर्ष के बाद ही सन 1918-19 में यह पत्नी भी प्रसूती रोग से चल बसी । भावुक हृदय प्रसाद के लिए यह अत्यंत गहरी चोट थी। इसके उपरांत प्रसाद भी शादी नहीं करना चाहते थे। लेकिन विधवा भाभी के जिद पकड़ लेने पर तीसरा विवाह किये जिससे उन्हें रत्न शंकर नामक पुत्र प्राप्त हुआ 

                      सन 1925 से उनके पेट में दर्द होने लगा और 1928 तक आते-आते काफी बढ़ गया। चिकित्सक कविराज प्रताप सिंह के अनुसार अत्यधिक बादाम के सेवन से आँतों का रोग हो गया।  कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी संवत 1994 (तदनुसार 14-15 नवंबर 1937) की रात्रि के तीसरे पहर में मात्र 48 वर्ष की आयु में जर्जर शरीर निष्प्राण हो कर हिंदी साहित्य के एक अध्याय का पटापेक्ष कर गया ।
      कृतियां - जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य की    अभिव्यक्ति की अनेक विधाओं में सेवा किये । उपन्यास, नाटक ,कहानी ,काव्य आदि सभी कुछ लिखे हैं । बाल्यावस्था में ही इन्होंने अपने शिक्षक को सुनाया "हारे सुरेश,रमेश ,धनेश गनेसहु सेस न  पावत पारे " और आशीर्वाद प्राप्त किया । इनकी प्रथम कविता भारतेंदु नामक पत्र में मई-जून का संयुक्तांक में 1905 में प्रकाशित हुई थी।  उनकी रचनाओं का क्रम अनुसार निम्नवत लिखा जा सकता है ।
काव्य - प्रेम राज्य , श्वासोच्छ्वास , प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व , चित्राधार,कानन कुसुम,आंसू, झरना, लहर ,कामायनी, चम्पू उर्वशी !
नाटक -सज्जन , कल्याणी परिणय,प्रायशिचत,राज्यश्री, करुणालय,विशाख, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयग, कामना,एक घूंट, स्कंदगुप्त विक्रमादित्य,चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी !
कहानी संग्रह-  छाया, प्रतिध्वनी, आकाश दीप, इंद्रजाल, आँधी, पांच कहानियां , रजत शिखर!
उपन्यास - कंकाल, तितली ,शरावती!
निबंध संग्रह -काव्यकला !
विविध -प्राचीन आर्यावर्त ,प्रथम सम्राट!

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