आतंकवाद से भी ज्यादा क्रूर है तीन तलाक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के साथ क्रूरता है,यह ना ही मानव समाज में व मुस्लिम समाज के लिए हितकारी है इससे मानवता का हनन होता है जहां आज विश्व में मुस्लिम समुदाय की औरते काफी तेजी के साथ विकास कर रही है वही भारत एवं कुछ अन्य देशों में तीन तलाक की प्रथा का प्रचलन है जो मुस्लिम समुदाय के विकास में एक बाधा के रूप में आगे आ जाता है। तीन तलाक का गलत अर्थ निकाल कर लोग इसे एक तलवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें गर्दन मासूम औरत का होता है और शायद जो लोग इस तरह की तलाक के समर्थन करते हैं उन्हें पता ही नहीं है कि सुलह के प्रयास विफल होने पर कुरान तलाक की अनुमति देता है। लेकिन यह कैसा न्याय है कि फोन करके तलाक तलाक तलाक कह देने से तलाक हो गया, ऐसा ही तमाम चौकाने वाला मामला सामने आया है क्या मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध लोगो का दायित्व नहीं होता है कि इसके खिलाफ खड़े होकर इस तरह के हो रहे अन्याय को खत्म करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ लोग पर्सनल लॉ का हवाला देते हैं पर्सनल ला संविधान के ऊपर हो ही नहीं सकता क्योंकि संविधान हमारे देश का सबसे पवित्र व ऊंचा ग्रंथ है जिसके खिलाफ जाना एक अपराध ही होगा ।कुछ लोगों की ट्रिपल तलाक पर गलत व्याख्या से समाज में इस तरह की बुराई का जन्म होता है और लोगों को इस बुराई में लिप्त कर बिना सुलह का कोई प्रयास करें बिना तलाक देने के लिए प्रोत्साहित करता है जो कि गलत है । माना पवित्र कुरान ताला "तलाक" या "खुला" की छूट देता है। पर इसके नियमों का पालन कर के ही सही मायने में तलाक को समझा जा सकता है। और हम लोग इस बुराई से बच सकते है।
अजीत कुमार चौधरी



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