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गंदगी से समझौता न करें !


स्वच्छता मनुष्य की जागरूकता एवं सुरुचिपूर्ण दृष्टिकोण की परिचायक हैं। मनुष्य की सौन्दर्यप्रियता  एवं सतर्कता के भाव का पता इस बात से लगता है कि वह कितना स्वच्छताप्रिय है? रोजमर्रे  के जीवन में अपने घर पर कार्यक्षेत्र में कोई किस तरह रहता है, अपने काम आने वाली वस्तु को कैसे संभालता है यह व्यक्ति के व्यक्तित्व के स्तर को बताने वाला ठोस प्रमाण है । इसी आधार पर उसकी निगाह का पैनापन देखा जाता है एवं ऐसे लोगों को ही वैचारिक दृष्टि से परिपक्व समझा जाता है कि वे कैसा स्वच्छ एवं सुरुचिपूर्ण जीवन जीते हैं ? प्रशासनिक परीक्षा में सामान्य ज्ञान के अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि छात्र कितना सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व का है । यह उसके स्वभाव का अंग बना है कि नहीं ।
         यो स्वच्छता हाथ से की जाती है बुहारी झाड़न, पानी , साबुन , आदि के सहारे हाथों का श्रम किसी भी स्थान एवं वस्तु को स्वच्छ बना देता है । पर यह तभी संभव है, जब चिंतन क्षेत्र में सफाई को सुंदरता का प्रतीक और अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया हो। ऐसा दृष्टिकोण विकसित होने पर मनुष्य की पैनी निगाह यह तलाश करती रहती है कि गंदगी और फूहड़पन कहां है । वह जहां भी हो सके उसकी आंखों में कांटे की तरह चुभेगी और वह उसे दूर किए बिना चैन लेगा । दूसरों को अपनी सुरुचि का परिचय देकर सम्मान पाने की दृष्टि से नहीं वरन आत्मसंतोष की दृष्टि  से भी यह नितांत आवश्यक हैं कि गंदगी के प्रति गहरी घृणा और उससे तत्काल जूझ पड़ने की तत्परता और साहसिकता अपने स्वभाव का अविच्छिन्न अंग बनकर रहे ।
             कितने ही व्यक्तियों को गंदगी से घृणा ही नहीं होती वह मैली-कुचैली वस्तुओं का उपयोग करते रहने घिनौने वातावरण में रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
उन्हें यह सब सहन हो जाता है फिर गंदगी अखरती नहीं, सफाई के साधन उपलब्ध होते हुए भी इस ओर ध्यान नहीं जाता । फलस्वरुप समय रहते इसे हटाने का प्रयत्न नहीं बन पड़ता । इसके पीछे न कोई कठिनाई नहीं अपितु अपनी आदत को गंदगी से समझौता करने के अनुरूप बना लेना है। जो चीज अखरेगी नहीं उसे हटाने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं होगी।
                      सफाई तभी रह सकती है , जब मनुष्य का स्वभाव ही व्यवस्था एवं सुसज्जा रखने वाला हो, सफाई सहज ही उसे रुचने लगे, उसका स्वभाव बन जाए एवं संस्कार ही बन जाए अन्यथा कपड़े, पुस्तक , जूते कलम , कागज, खिलौने यहां-वहां जैसे-तैसे पटक दिए जाने पर एक क्षण पहले की सफाई दूसरे ही क्षण गंदगी में बदल जाएगी । गंदगी अपने आप भी फैलती है। उसे साफ करने का हर घड़ी ध्यान रखा जाए और तत्परता बरती जाए तभी सफाई रहना संभव है। हवा के साथ धूलि कणो का प्रवेश निरंतर होता रहता है । शरीर में नित्य पसीना निकलता रहता है यदि उसे बार-बार साफ न किया जाए , नहलाया धुलाया ना जाए तो गंदगी की परत जमने लगेगी और बदबू आने लगेगी। किसी भी समान को यूंही खुला छोड़ देने पर वह भी मैला हो जाता है। कमरे में लंबे अरसे तक यदि सफाई ना की जाए तो वहां कूड़ा कचरा इकट्ठा हो जाएगा । आज के धुले कपड़े कल पुनः मैले हो जाएंगे इसे रोका नहीं जा सकता । इससे निपटने का एक ही तरीका है की जहां मलिनता दिखे पड़े उसे तत्काल निपटने के लिए जुट पड़ा जाए ।

"मोदी और योगी जी ने मिलकर देश में 
फैली गंदगी को साफ करने का वचन लिया"


     प्रकृति भी अपना संतुलन इसी प्रक्रिया द्वारा बनाए रखती है। उसने अनुपयोगी को हटाने एवं परिवर्तित करने के लिए छोटे से छोटे जीव से लेकर बड़े पक्षी तक को अपना सफाई कर्मचारी नियुक्त कर रखा है। पक्षियों में बाज इसी स्तर के कार्य में जुटे रहते हैं । जहां इसे बड़ी पक्षियों एवं अन्य जानवर अपना भोजन बना लेते हैं। वही वैक्टीरिया एवं जीवाणु पंचभूतों से बनी काया को लीन करने के लिए जुट जाते हैं ।
         प्रकृत ने स्वाभाविक रूप से मनुष्य को स्वच्छता प्रेमी बनाया है । स्वच्छता से प्यार एवं गंदगी से घृणा। तभी तो अधिकांश व्यक्ति गंदगी को नापसंद करते हैं और नाक-भौं सिकोड़ते हैं। पर स्वयं दूर करने का प्रयास नहीं करते । दूसरा कोई आकर उसे साफ करें इस इंतजार में बैठे रहते हैं यह स्वच्छता प्रिय होने का प्रमाण नहीं है । सफाई पसंद होना ही पर्याप्त नहीं है गंदगी से घृणा करने से ही काम नहीं चलता वरन उसका काम तब पूरा होता है जब गंदगी को हटाने में तत्परता बरतना भी उतना ही प्रिय लगने लगे जितना की स्वच्छता को देखना। इसके लिए स्वयं अपने हाथों को सक्रिय बनाना पड़ता है।
         कुछ लोग अपने घरों को बैठक को अति सुंदर बनाने के प्रयास में लगे रहते हैं इसके लिए कीमती सामान लाने से लेकर सुगंधित पदार्थ का प्रयोग करते हैं । किंतु नित्य प्रयोग में आने वाली स्थान जैसे लैट्रिन रूम, बाथरूम, नाली वाशबेसिन आदि की सफाई की ओर ध्यान नहीं देते । उसमें  गंदगी फैलती रहती है। मच्छर , मक्खियां भी भिनभिनाती रहती हैं ,लोग नाक भौं सिकोड़ते रहते हैं किंतु उनके हाथ उस ओर नहीं बढ़ते । किसी भी घर के इन वस्तुओं को देखने मात्र से पता चल जाता है कि यहां के परिजन किस स्तर के हैं। दो-चार दिन सफाई कर्मचारी के ना आने से तो समूचा घर नर्क बन जाता है इसके लिए अच्छा होगा अपना काम स्वयं किया जाए ।
          स्वच्छता मात्र अपने साथ सुंदरता ही नहीं लाटी वरन मनुष्य के शारीरिक, मानसिक , स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है । शरीर की सफाई यदि नित्य नियमित सही ढंग से ना हो तो दाद,खुजली, फोड़े फुंसी जैसे रोग सहज ही आ सकते हैं । विधाता ने शरीर को एक शानदार सुरक्षा बल स्वेत रक्त कणों के रूप में दिया है। वे इसकी सुरक्षा बाहरी विषाणुओं से करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं । लेकिन यदि कोई अपनी इस फौजी दल की अवहेलना करें उसे पोषण ना दे तो कब तक ऐसी फौज उसे अभी अविजित बनाए रख सकती हैं ? खान-पान में निहित गंदगी रक्त को दूषित करती हैं।और रहन-सहन में आई अस्तव्यस्ता,आलस्य और प्रमाद के विषाणुओं को आमंत्रित करती हैं । फलस्वरुप शरीर रुग्ण ,  कृषकाय , दुर्बल, निस्तेज साधन अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कहां तक सफल हो सकता है?
                                  स्वच्छता की आवश्यकता अध्यात्मिकता प्रगति के लिए भी  अनुभव की गई है । यहां बाह्य एवं आंतरिक दोनों ही स्वच्छता को अनिवार्य माना गया है।बाह्य स्वच्छता अतिरिक्त स्वच्छता का परिचायक है । यदि हमारा शरीर मलिन एवं दुर्गंधपूर्ण है कपड़े मैले हैं भोजन गंदा है स्थान मलिन एवं रहन सहन अस्त-व्यस्त है। तो हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि हमारा मन मस्तिष्क स्वच्छ रहेगा । हमारे विचार, हमारी भावनाएं अध्यात्मिकता पथ का अनुसरण कर सकेगी।
             जिसने अपने शरीर, भोजन,वस्त्र,घर-परिवार परिजनों तथा पड़ोसी को स्वच्छ एवं पवित्र रखना सीख लिया है, उसका व्यक्तित्व विकसित स्तर का है एवं उसने आत्मलाभ का मूलमंत्र जान लिया है । आवश्यकता इस बात की है कि इस दिव्य गुण को अपने अंदर विकसित किया जाए एवं दूसरों को प्रेरणा- प्रोत्साहन दिया जाए ताकि वह भी उसी पथ का अनुसरण कर सकें।
              
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                    लेखक-अजीत कुमार चौधरी

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