इंटरनेट के दुष्प्रभाव से बचें
इंटरनेट आधुनिक युग की देन है । समाज में सूचनाओं को संप्रेषित करने और ज्ञान के प्रसारण में इंटरनेट नें अहम भूमिका निभाई है । इसके माध्यम से एक ओर जहां लोगों के बीच की दूरियां कम हुई है, वहीं दूसरीओर दूरियां बड़ी भी हैं । इसका उपयोग करके लोग दूर बैठे हुए अपने परिजनों को देख सकते हैं, उनसे बातें कर सकते हैं, देश-विदेश का मानचित्र देख सकते हैं, आने-जाने के मार्ग तलाश कर सकते हैं , वही इसके अत्यधिक इस्तेमाल से लोगों का आपस में संपर्क कम हो रहा है और मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं, जो कि चिंता का विषय है।
यह बात पूरी तरह सच है कि इंटरनेट मानसिक बीमारियां बढ़ा रहा है और इसका कारण है- कुछ लोगों को इंटरनेट की लत हो जाना । इस बारे में किए गए एक शोधकार्य में यह पता चला है कि दुनियाभर में 18.2 करोड लोग इंटरनेट की लत से शिकार हो गए हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार , इंटरनेट की लत से नए तरह की मानसिक बीमारियों का जन्म हो रहा है। इनमें से एक को 'नेटब्रेन' का नाम दिया गया है । इस बीमारी के होने पर व्यक्ति को असामाजिकता और मानसिक रूप से विचलित होने जैसी मानसिक व सामाजिक समस्याएं होने लगती हैं ।
ऐसे लोग ऑनलाइन जुए,लगातार सोशल मीडिया के इस्तेमाल और ऐप्स इस्तेमाल करने के आदी हो जाते वही इनके लगातार इंटरनेट पर बने रहने के कारण यह आफिस और घर में तनाव में रहने लगते हैं ।भावुक लोगों में इस बीमारी के होने की आशंका सामान्य से 3 गुना अधिक होती है , जबकि यही आशंका फोन का अत्यधिक प्रयोग करने वालों में 6 गुना अधिक तक हो सकती है तथा वही स्मार्टफोन प्रयोग करने वाले में यह आशंका सामान्य की तुलना में 16 गुना अधिक तक हो सकती है । इन आशंकाओं के कारण ऐसे व्यक्तियों के काम और जिंदगी में असंतुलन का खतरा 3 गुना बढ़ने की संभावना भी है । यदि व्यक्ति इंटरनेट पर वक्त गुजारने के लिए दूसरे महत्वपूर्ण कार्यों को नजरअंदाज करने लगे इंटरनेट से दूर होने पर तनाव महसूस करें तो समझना चाहिए कि इंटरनेट की लत उस व्यक्ति को लग गई है और अब उसे सावधानी की जरूरत है । ऐसे व्यक्तियों की समाज विरोधी गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं । ऐसे लोगों का इलाज करने के लिए उन्हें सबसे पहले 72 घंटे तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर रखा जाता है इसके बाद उन्हें खाने के समय फोन बंद करने और परिवार दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारने के लिए सिखाया जाता है शोध अध्ययनों से यह बात भी सामने आई है कि गैजेट्स के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ता है इसका कारण यह पाया गया है कि मोबाइल, लैपटॉप, टैब या कसी अन्य वायरलेस गैजेट से हानिकारक रेडियेशन निकलता हैं, जो बच्चों के मस्तिष्क में मौजूद ऊतकों पर बुरा असर डालते हैं, क्योंकि बच्चों का मस्तिष्क बड़े लोगों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
यह बात पूरी तरह सच है कि इंटरनेट मानसिक बीमारियां बढ़ा रहा है और इसका कारण है- कुछ लोगों को इंटरनेट की लत हो जाना । इस बारे में किए गए एक शोधकार्य में यह पता चला है कि दुनियाभर में 18.2 करोड लोग इंटरनेट की लत से शिकार हो गए हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार , इंटरनेट की लत से नए तरह की मानसिक बीमारियों का जन्म हो रहा है। इनमें से एक को 'नेटब्रेन' का नाम दिया गया है । इस बीमारी के होने पर व्यक्ति को असामाजिकता और मानसिक रूप से विचलित होने जैसी मानसिक व सामाजिक समस्याएं होने लगती हैं ।
ऐसे लोग ऑनलाइन जुए,लगातार सोशल मीडिया के इस्तेमाल और ऐप्स इस्तेमाल करने के आदी हो जाते वही इनके लगातार इंटरनेट पर बने रहने के कारण यह आफिस और घर में तनाव में रहने लगते हैं ।भावुक लोगों में इस बीमारी के होने की आशंका सामान्य से 3 गुना अधिक होती है , जबकि यही आशंका फोन का अत्यधिक प्रयोग करने वालों में 6 गुना अधिक तक हो सकती है तथा वही स्मार्टफोन प्रयोग करने वाले में यह आशंका सामान्य की तुलना में 16 गुना अधिक तक हो सकती है । इन आशंकाओं के कारण ऐसे व्यक्तियों के काम और जिंदगी में असंतुलन का खतरा 3 गुना बढ़ने की संभावना भी है । यदि व्यक्ति इंटरनेट पर वक्त गुजारने के लिए दूसरे महत्वपूर्ण कार्यों को नजरअंदाज करने लगे इंटरनेट से दूर होने पर तनाव महसूस करें तो समझना चाहिए कि इंटरनेट की लत उस व्यक्ति को लग गई है और अब उसे सावधानी की जरूरत है । ऐसे व्यक्तियों की समाज विरोधी गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं । ऐसे लोगों का इलाज करने के लिए उन्हें सबसे पहले 72 घंटे तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर रखा जाता है इसके बाद उन्हें खाने के समय फोन बंद करने और परिवार दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारने के लिए सिखाया जाता है शोध अध्ययनों से यह बात भी सामने आई है कि गैजेट्स के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ता है इसका कारण यह पाया गया है कि मोबाइल, लैपटॉप, टैब या कसी अन्य वायरलेस गैजेट से हानिकारक रेडियेशन निकलता हैं, जो बच्चों के मस्तिष्क में मौजूद ऊतकों पर बुरा असर डालते हैं, क्योंकि बच्चों का मस्तिष्क बड़े लोगों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
'जर्नल ऑफ माइक्रोस्कोपी एंड अल्ट्रास्ट्रक्चर' में छपी एक रिपोर्ट से पता चला की वयस्कों की अपेक्षा बच्चों इस रेडिएशन को जल्दी ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि उनके सिर पर ऊपरी हिस्सा और आकार वस्यको की तुलना में पतला और छोटा होता है । इसलिए गर्भवती महिला के पेट में पल रहे शिशु के लिए भी गैजेट्स को खतरनाक बताया गया है, क्योंकि इससे भ्रूण को नुकसान पहुंच सकता है और यही कारण है कि गर्भवती महिलाओं को अक्सर चेतावनी दी जाती है , कि वह अपने पॉकेट में मोबाइल आदि ना रखें बात केवल बच्चों को इन गैजेट से दूर रखने की नहीं बल्कि हकीकत यह है कि जो मां बाप अक्सर बच्चों को मोबाइल या कंप्यूटर के ज्यादा इस्तेमाल के लिए टोकते व रोकते हैं। वही अपना ध्यान बच्चों से ज्यादा गैजेट्स पर देते हैं। अमेरिका स्थित बोस्टन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में हाल ही में हुए शोध अध्ययन यह दर्शाते हैं कि गैजेट्स के अत्यधिक इस्तेमाल का पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ता है
इस शोध अध्ययन में 44 परिवार के माता-पिता और बच्चों के बीच के होने वाले संवादों को रिकॉर्ड किया गया और उनका विश्लेषण किया गया। विश्लेषण में मुख्य रुप से यह देखा गया कि इन दोनों पक्षों के बीच किस तरह के संबंध है वह आपस में कैसा व्यवहार करते हैं , एक दूसरे का कितना ख्याल रखते हैं साथ ही खाना खाते हैं या नहीं । और उन्होंने पाया कि बच्चों से बातचीत करते या खाना खाते समय 30% माता-पिता पूरी तरह से मोबाइल में उलझे हुए थे।
जबकि 16 फ़ीसदी माता-पिता बीच में मोबाइल उठाकर देखा करते हैं।शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जब अभिवावक अपना मोबाइल फोन खंगालने में व्यस्त थे तब उनके बच्चे उनकी नजर पाने को तरस रहे थे वह उस समय कोई ना कोई गलती कर रहे थे। जिससे मां-बाप का ध्यान मोबाइल के ऊपर से हट कर उन बच्चों पर पड़े।
इस बारे में प्रसिद्ध बाल विशेषज्ञ'शेरी टर्कल' आधुनिक डिजिटल युग में नई पीढ़ी जिस गति से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है उसे देखते हुए कई लोगों का मानना है कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएगा पर दूसरी तरफ ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं की स्मार्टफोन,टैबलेट , रीडिंग और लैपटॉप जैसे गैजेट्स नई पीढ़ी की एकाग्रता व चिंतन की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे हैं ।
इस बारे में प्रसिद्ध बाल विशेषज्ञ'शेरी टर्कल' आधुनिक डिजिटल युग में नई पीढ़ी जिस गति से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है उसे देखते हुए कई लोगों का मानना है कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएगा पर दूसरी तरफ ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं की स्मार्टफोन,टैबलेट , रीडिंग और लैपटॉप जैसे गैजेट्स नई पीढ़ी की एकाग्रता व चिंतन की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे हैं ।
इसके माध्यम से हमें जानकारियां बहुत मिलते हैं, लेकिन किसी भी विषय पर अनेक तरह के मत प्राप्त होते हैं, जिससे किस पक्ष को सही मानते हुए उसे स्वीकार आ जाए , उस पर गहराई से विचार किया जाए उसे सही मानते हुए उस पर गहराई से विचार किया जाए यह सुनिश्चित नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त आजकल लोग जानकारी को याद करने के स्थान पर उन्हें Google , Wikipedia जैसे नेट पोर्टल से लेना पसंद करते हैं, जिससे सबकी याददाश्त पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है ।
यह सच है इंटरनेट में गैजेट से कई तरह के फायदे हैं और इसमें हमें कई तरह की सुविधाएं भी आसानी से मिल जाती हैं , पर वहीं इसके कई दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं जिसके समाधान के लिए समय रहते सही प्रयास करने की आवश्यकता है यह जरूरी है कि इंटरनेट में कहां इस्तेमाल एक सीमित दायरे में रहकर किया जाए, इनकी लत से बचा जाए और अपने जीवन को इसके दुष्परिणामों से बचाया जाए।
यह सच है इंटरनेट में गैजेट से कई तरह के फायदे हैं और इसमें हमें कई तरह की सुविधाएं भी आसानी से मिल जाती हैं , पर वहीं इसके कई दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं जिसके समाधान के लिए समय रहते सही प्रयास करने की आवश्यकता है यह जरूरी है कि इंटरनेट में कहां इस्तेमाल एक सीमित दायरे में रहकर किया जाए, इनकी लत से बचा जाए और अपने जीवन को इसके दुष्परिणामों से बचाया जाए।
दोस्तों हमें उम्मीद हैं कि आप को यह पोस्ट जरुर पंसद आयेगा और आप से विन्रम हैं कि इस पोस्ट शेयर करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जागरूक हो सकें। कमेंट जरुर करें अपना सुझाव और आशीर्वाद हमे प्रदान करें। लेखक - अजीत कुमार चौधरी
source-akhand joyti




Post a Comment